Wednesday, April 20, 2011

कभी कभी भूलना भी याद करना होता है

कभी कभी भूलना भी याद करना होता है
ऐसे ही किसी समय में
जब मैं तुम्हें भूलने की कोशिश में लगा था
वो शायद अप्रेल के आखिरी दिनों की दोपहर रही होगी कोई
मैं इस देह के बीयाबान बन के खयाल में राह भटका था
कि एक गुलमोहर मिला
अपने पूरे नाजोनखरे के साथ
बहुत शर्माया सा
कि सुर्ख होठ थे उसके और ललाई गालों तक फैली थी
मेरे कान के पास आकर बोला
बहुत गुजरे हो मेरी छाँह से
और शाम के झुटपुटे में इस सघनता में
थामा है कोई हाथ गर्माहट भरा कई कई बार
आज बस इतना भर कर दो
इस पड़ौसी अमलतास से मुझे भी मिलवा दो
मेरा हाथ बस उसकी देह से छुआ दो
आज मेरे भीतर भी कुछ उमड़ा है
मैंने एक डाल को पकड़ अमलतास से छुआ भर दिया
कि बस क्या था
अमलतास ने एक आह भरी ठंडी
और उसकी देह से चाँदनी फूटने लगी
जिसके पानी के झिलमिलाते अक्स में
मुझे अपना बहुत कुछ याद आया

Tuesday, April 5, 2011

कविता

इस धूप में भी तुम कहाँ से चुरा लाती हो बादल
और छोड़ जाती हो उसे मेरे बिस्तर की सलवटों में
सुबह ख्वाब से उठकर मैं उन सलवटों में
बस तुम्हारी नमी ढूँढ़ता हूँ .

Saturday, April 2, 2011

भाषा, मेरी ज़ुबान... मेरा साथ दो (प्रार्थना)

ओ मेरी भाषा!
इस तरह हकलाओ मत
मेरा साथ दो

जब प्यार में इतनी खूबसूरती से साथ दिया
तो अब मत छोड़ो मुझ निरीह को इस तरह वध्य और अकेला
तुम्हें गढ़ने ही होंगे मेरे लिए
कुछ रूपक अकेलेपन के दुख के भी
इन बिछोह के काँच के किरचों पर चलने को भी
तुम्हें ही देनी होगी अभिव्यक्ति
ओ भाषा!
तुम इतना सा और साथ दो मेरा

ओ मेरी ज़ुबान!
जब इतने स्वाद भरे जीवन को तुमने जीया है
तो इन छालों को भी तुम्हें ही सहना होगा.
तुम साथ दो मेरा

ओ मेरी आवाज!
इस दिल को
एक खिलंदड़ गेंद में तुमने ही बदला है
तो अब इसकी उधड़न को भी कहना ही होगा
तुम साथ दो मेरा

Wednesday, March 2, 2011

मैं एक पेड़

तुम्हारी इच्छा करते-करते
मैं एक पेड़ में बदल गया हूँ
अब इसकी टहनियों पर
आकर अटकती रहती हैं
तुम्हारी यादों की पतंगें

इसकी एक शाख
जो ठीक तुम्हारी बालकनी तक आ पहुँची है
उससे बाँध सकती हो
तुम अपनी निगाह की अलगनी
और डाल सकती हो
प्यार के रंग भरे कपड़े
बचाते हुए सूरज की रोशनी से
या किसी इतवार बाँच सकती हो अखबार
सुबह की चाय के साथ
इसकी पत्तियों को छूते हुए

इसकी छाया के लिए अब कुछ कहना न होगा
उसका तुम मनचाहा कुछ कर सकती हो
और इसकी कलियों की गंध से
महका सकती हो अपनी नींद के ख्वाबों को

Friday, January 28, 2011

अभी-अभी तुमने और मैंने ...

अभी-अभी आसमान को डायरी का पहला सफ़हा बनाकर
अपने दस्‍तख़त के साथ
तुमने मेरे लिए तारा लिपि में कविता लिखी है

मैंने भी तुम्हारे लिए इस नम माटी से
एक दिल बनाया है
तुम आओ
अपने कैनवास 'शू' पहने
उस पर सुन्दर छाप बनाओ
इस नीम से एक टहनी माँगो
उसमें अपनी इच्छाओं के गुब्बारे टाँगो
फिर यहाँ खड़े हो
उड़ाओ बेफिक्री से

Wednesday, January 19, 2011

नहीं नहीं अब तुम मुझे याद नहीं आती

मेरी जीभ के छोर पर बचा रह गया खारापन
तुम्हारे ही शरीर के समंदर से उपजा था
और अब दौड़ रहा है घुलकर
मेरे रक्त में खलबली मचाता हुआ
वो जो खुश्बू थी तुम्हारे पसीने के इत्र से बनी
अब मेरी सांसों का हिस्सा है
तुम्हारे और मेरे बीच की दूरी और नज़दीकी की नाप का अहसास
गुदा है मेरे इस हृदय पर
तुम्हारे मुझसे उस तरह लिपटकर मिलने से बने निशान
अब भी उभरे हैं इस देह पर

अब इससे ज्यादा मैं और कैसे कहूं
कि नहीं नहीं अब तुम मुझे याद नहीं आती

Tuesday, January 4, 2011

तुम और मैं

1.
तुम हो दूर एक ख्वाबगाह
मैं हूँ यहाँ पड़ी एक परती जमीन
शुक्र है कि हमारे बीच यह चाँद है
और हम दोनों पर एक साथ पड़ रही है इसकी चाँदनी

2.
तुम पर्दा बनो
और मेरे कंधो के पेलमेट पर लटक जाओ
या कपड़ों की तरह मुझ अटैची में समा जाओ
तुम चाकू भी बन सकती हो
ताकि तरबूज की तरह मुझमें धँस पाओ

या फिर ऐसा करते हैं
मैं अपनी कमीज में दिल के सबसे पास वाला काज बनता हूँ
और तुम बटन बन कर वहाँ टँग जाओ
इस तरह तुम साथ भी रहोगी
और दिल के इतना करीब भी